ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 1
पाठ का परिचय (Introduction):
'बात अठन्नी की' सुदर्शन जी द्वारा लिखित एक अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी कहानी है। यह कहानी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, न्याय व्यवस्था के दोहरे मापदंड और गरीबों के शोषण को उजागर करती है। कहानी दर्शाती है कि कैसे एक गरीब को केवल आठ आने (अठन्नी) की चोरी के लिए कठोर दंड मिलता है, जबकि बड़े अफ़सर हज़ारों की रिश्वत लेकर भी समाज में सम्मानपूर्वक जीते हैं।
रसीला कई वर्षों से इंजीनियर बाबू जगतसिंह के यहाँ दस रुपये महीने के वेतन पर नौकरी कर रहा था। उसके गाँव में उसके बूढ़े पिता, पत्नी और तीन बच्चे थे, जिनका भरण-पोषण इसी वेतन से होता था। महंगाई के कारण दस रुपये पर्याप्त नहीं थे, फिर भी वह जगतसिंह के यहाँ से काम नहीं छोड़ता क्योंकि उसे वहाँ 'संदेह' (शक) नहीं किया जाता था और वह इसे अपना कर्त्तव्य मानता था।
एक बार रसीला के बच्चे बीमार पड़ गए। उसने मालिक जगतसिंह से पेशगी (Advance) माँगी, लेकिन उन्होंने कठोरता से मना कर दिया। ऐसे मुश्किल समय में उसके मित्र, पड़ोसी चौकीदार रमज़ान ने अपनी बचत में से उसे कुछ पैसे देकर मदद की। बच्चे ठीक हो गए और रसीला ने कर्ज़ चुका दिया, लेकिन आठ आने (अठन्नी) का कर्ज़ अभी भी बाकी रह गया था।
एक दिन जगतसिंह ने किसी काम के लिए रसीला को पाँच रुपये दिए। रसीला ने अठन्नी बचाने के लिए साढ़े चार रुपये का सामान खरीदा और बची हुई अठन्नी रमज़ान को देकर अपना कर्ज़ चुका दिया। लेकिन जगतसिंह को शक हो गया। उन्होंने रसीला को बुरी तरह पीटा और जुर्म कबूल करवा लिया। जगतसिंह उसे पुलिस के पास ले गए और सिपाही को पाँच रुपये की रिश्वत देकर कहा कि "मनवा लेना"।
अगले दिन रसीला का मुक़दमा शेख सलामुद्दीन (जो खुद बड़े रिश्वतखोर थे) की अदालत में पेश हुआ। रसीला ने झूठ नहीं बोला और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। शेख साहब ने उसे छह महीने की कठोर सज़ा सुना दी।
इस फैसले को सुनकर रमज़ान बहुत दुखी और क्रोधित हुआ। कहानी के अंत में रमज़ान टिप्पणी करता है कि "यह इंसाफ़ नहीं, अंधेर है। सिर्फ एक अठन्नी की ही तो बात थी।" इसी रात जगतसिंह और सलामुद्दीन अपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे, जबकि उन दोनों ने मिलकर हज़ारों की रिश्वत ली थी।
प्रसंग: यह वाक्य रसीला ने इंजीनियर बाबू जगतसिंह से तब कहा जब उसने पाँच रुपये में से आठ आने की चोरी की थी और पकड़ा गया था।
व्याख्या: रसीला स्वभाव से चोर नहीं था। उसने मज़बूरी में अठन्नी बचाई थी। पकड़े जाने पर वह अपनी गलती मान लेता है और माफ़ी माँगता है। यह उसकी ईमानदारी और भोलेपन को दर्शाता है कि वह अपराध छिपाने के लिए और झूठ नहीं बोलता।
प्रसंग: यह वाक्य रमज़ान ने तब कहा जब मजिस्ट्रेट शेख सलामुद्दीन ने रसीला को छह महीने की सज़ा सुनाई।
व्याख्या: यह कहानी का सबसे शक्तिशाली व्यंग्य है। रमज़ान जानता था कि शेख साहब खुद हज़ारों की रिश्वत लेते हैं। उसे इस दोहरी न्याय व्यवस्था पर क्रोध आता है जहाँ एक ग़रीब की छोटी सी मज़बूरी को बड़ा जुर्म मानकर कठोर सज़ा दी जाती है, जबकि बड़े अपराधी आज़ाद घूमते हैं।
प्रश्न 1: रसीला ने बाबू जगतसिंह की नौकरी क्यों नहीं छोड़ी?
उत्तर: रसीला बाबू जगतसिंह के यहाँ कई वर्षों से काम कर रहा था। अमीर लोग नौकरों पर विश्वास नहीं करते, पर जगतसिंह ने उस पर कभी संदेह नहीं किया था। रसीला सोचता था कि कहीं और जाने पर शायद ग्यारह-बारह रुपये मिल जाएँ, पर यहाँ जैसी इज़्ज़त और विश्वास नहीं मिलेगा। इसी कृतज्ञता के कारण उसने नौकरी नहीं छोड़ी।
प्रश्न 2: रमज़ान ने रसीला की मदद कैसे की? इससे उसके चरित्र की कौन-सी विशेषता प्रकट होती है?
उत्तर: जब रसीला के बच्चे बीमार थे और उसे पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, तब जगतसिंह ने पेशगी देने से मना कर दिया था। उस समय रमज़ान ने अपनी संचित राशि (savings) में से कुछ पैसे रसीला को दिए। इससे रमज़ान की सच्ची मित्रता, निस्वार्थ भावना, और मानवीय संवेदना प्रकट होती है। धर्म अलग होने के बाद भी उसने इंसानियत को सर्वोपरि रखा।
प्रश्न 3: "रात के समय जब पाँच सौ और हज़ार के चोर नर्म गद्दों पर मीठी नींद ले रहे थे, अठन्नी का चोर जेल की तंग और अँधेरी कोठरी में पछता रहा था।" आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से समाज की न्याय व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया गया है। 'पाँच सौ और हज़ार के चोर' बाबू जगतसिंह और शेख सलामुद्दीन हैं, जो बड़े पदों पर बैठकर हज़ारों की रिश्वत लेते हैं और सम्मान का जीवन जीते हैं। दूसरी ओर रसीला है, जिसने मज़बूरी में केवल आठ आने की चोरी की, लेकिन समाज और कानून ने उसे अपराधी मानकर जेल की अंधेरी कोठरी में डाल दिया। यह अमीरों के भ्रष्टाचार और गरीबों की बेबसी का कटु यथार्थ है।